95. Saka Sarhand – Poem in Hindi

Dedicated to Supreme Sacrifice of Dhan Mata Gujri Ji (Mother of Dhan Shri Guru Gobind Singh Ji) and Younger Sons of Dhan Shri Guru Gobind Singh Dhan Baba Jorawar Singh Ji (Aged 9) and Dhan Baba Fateh Singh Ji (Aged 7).

साका सरहंद
बाँह थाम ली ‘दादी’ की, जब न पहुँचे भाई बड़े,
दृढ़ होकर चल पड़े, अपने कोमल पगों पे।
अनभिज्ञ नहीं था पथ वो, ‘दादे’ ने रक्त से सींचा था,
वो ‘दिल्ली’ थी ये ‘सरहंद’, अंत शायद ज्ञात था ।
फँस गया लोभी ‘गंगू’, माया की आँधी में,
सौंप दिए ‘पुत गोबिंद’ के, दुष्टों की छावनी में।
ठंडा था शत्रु का चित इतना, ठंडा बुर्ज भी हुआ पानी-पानी,
धन्य हैं माँ ‘गूजरी’ और ‘नन्हीं जानें’, शुक्राने में रातें निकाली।
आरम्भ किया स्वांग मक्कारों ने, अपनी ही नगरी में,
कहते थे अपने को सच का पुलिंदा, खाई जिन्होंने थी ‘कुरान’ की झूठी कसमें।
‘मासूमों’ ने मुँह तोड़ दिया सुच्चानन का, दिखा दिए अपने जलवे,
रक्त था ‘कलगीधर’, कैसे ना मारता उबाले?
पछाड़ दिया ‘खान’ को, निर्उत्तर उसे कर दिया,
वाह ‘जोरावर’ बोल उठी धरा, जब डंका बाजा ‘फतह’ का।
दाँत पीसता उठा काजी, सुना दिया झूठा फतवा,
छोड़े जकारे ‘नन्हें शेरों’ ने, काट दिया सर ‘सरहंद’ का।
ममता से भर गई ‘दादी’, दे दिए आशीष कई,
रख ली लाज सुतो ने मेरी, अब ‘सचखंड’ चलेंगे खुशी-खुशी।
आ गया समय अंतिम, बढ़ कर थामी ‘हिंद’ की बाँह,
चल पड़े हैं ‘शूर वीर’, अब झूझन को दाँव।
चीख़ पड़ी हर ईंट दीवार की, बंद करो जुल्म का नंगा नाच,
शांत किया उन ईंटों को, देकर अपने श्वास।
ऐसे थे ‘पुत्र गोबिंद’ के मेरे, चुका दिए ऋण सारे,
मिली विरासत में ‘शहीदी’, शहादत ही थी धर्म कर्म उनके,
मिला जो शत्रु रण क्षेत्र में, लड़ें वो शमशीरों से,
घुसा जब वो किले में अपने, हिला दी उसकी दीवारें,
‘शहीद दादे’ के पौत्र थे, बच्चे थे ‘सरबंस दानी’ के,
उम्र कच्ची थी मगर, थे वो हिंद के रखवाले। ‘तरुण’

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