94. Battle of Chamkaur

 

चमकौर का युद्ध
 
त्यागा है आज आनंदपुर, लिया है प्रण यही,
झोंकूँगा वंश सारा, दूँगा सर्वस्व की आहूति ।
सिरसा भी ना रोक सकी, ऐसी थी वो अखंड प्रतिज्ञा,
हार मान ली वेग ने उसके, सुनकर ‘सिंह’ की गर्जना।
धन्य हो गई गढ़ी चमकौर की, हर्ष से झूम उठी,
कि विश्राम करेंगें मुझमें ‘दशमेश’, और उनकी निर्भय टोली ।
सूर्य में भी वो धधक नहीं थी, छलक रहा था जो तेज चालीस ललाटों से,
खुलते ही किवाड़ दुर्ग के, गूँज उठा नभ जय कार से ।
टूट पड़े ‘सिंह गोबिंद’ के, केवल पाँच की टुकड़ी में,
क्या खूब लड़े वो रण बाँकुरें, मृत्यु ने भी टेक दिए घुटने ।
अस्त्र भी वो सहम गया, जिसने चूमा लहू ‘अजीत’ का,
शस्त्र भी वो पिघल गया, जिसने छुआ सीना ‘झुझार’ का ।
पर ना दहला हृदय शैतान का, रौंद डाली उसने मानवता,
कठोर था उर उसका, ऐसा नीच था ‘वजीर’ सरहंद का ।
हुई नमस्तक माटी चमकौर की, देख कर ऐसा पराक्रम,
मुख पर थी मुस्कान ‘दास परम पुरख’ के, पूर्ण किया अपना वचन ।
ऐसी फूँका संगीत ‘वीरों’ ने, अपनी ‘कृपाणों’ से,
डाल दिए स्वर्णमय पल, इतिहास की झोली में। ‘तरुण’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *