68. हमारे कर्म

चिर संचित कर्म हमारे,
व्यर्थ जाएंगे ‘उसके’ द्वारे,
ऊँघने दो सपनों को हमारे,
बुद्धि को दो चकराने,
तन को मारने दो करवटें,
मन को दो बोलने,
वंचित कर रख दिया हैं इन्होंने,
हर आत्मिक एहसास से,
पर है चल पड़ा,
क्षणिक संग्रह इन तत्वों का,
‘उस’ अनंत की खोज में,
समय उसका शत्रु है,
परिवर्तन है उसका रिपू,
भ्रम में डूबा हुआ,
शंका में धसा हुआ,
कभी पूछेगा सवाल ये,
कभी भटकेगा अन्धकार में,
कभी रुदन करेगा,
कभी विसमाद में रहेगा,
समेट कर सारे तथ्य भी,
कुछ पूर्ण नहीं होगा,
क्षीण हैं कर्म ये इतने,
बिना समर्पण कुछ प्राप्त नहीं होगा,
ना कटेगा फंदा यम का,
ना ही जीवन मुक्त होगा,
मिल भी गया अगर कुछ,
तो वो केवल मिथ्या होगा | ‘तरुण’

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