29. मेरी नन्ही अप्सरा

मेरी नन्ही अप्सरा

एक पल चंचला,अगले ही पल सहजता,

थिरकती हुई कोमल कोपलों पर, मेरी नन्ही अप्सरा |

तेरे आगमन का रुदन, था मेरे आस्तित्व का पुनर्जन्म,

तेरा प्रथम स्पर्श, धन्य हुआ पाकर वो हर्ष |

देन है तू दातार की, और वरदान गोबिंद का,

मधुर किलकारियों से तेरी, भर गयी रिक्त झोली मेरी |

साँय काल की तेरी प्रतीक्षा, और मेरा कुटिया में लौटना,

स्वार्थ हीन तेरा आलिंगन, जैसे हो शीतलमय चन्दन |

तेरी असीम उत्सुकता, प्रचंड वेग की कोई सरिता,

उत्तर की है आस हर क्षण, नहीं मिला तो भुगतो कोप दंड |

कष्ट माता पिता का, तेरे ललाट की गंभीरता,

विचलित होना मन का तेरे, हर लेता है दुःख सारे |

बाहिष्कार उस समाज का, जो समझते बिटिया को बला,

चाह केवल बाल गोपाल की, बिन राधा कृष्ण-गाथा कैसे पूरी?

अब डूबने दो पितृत्व में, अनंत प्रेम के सिन्धु में,

मथ लाया कुछ रत्न तो, कर दूँगा समर्पित नन्ही अप्सरा को | ‘तरुण’

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