106. Gum Hua Pal – Poem in Hindi

गुम हुआ पल
कहीं छिटक कर गिर गया, एक पल नन्हा सा,
बहुत खोजा उसे, उर की गहराइयों में।
कभी पलकों पर रुका, कभी आँखों में बसा,
चित ने भी प्रश्न पूछ लिया, क्या थी उस क्षण की विशेषता?
मन भी परेशान हो उठा, ढूंढने वो चल पड़ा,
टटोल डाले संग्रह कई, पर वो पल न मिला।
विचलित मन हो चला, व्याकुलता की लाँघ गया सीमा,
प्रकट हुई उसकी विवशता, कितनी सीमा में वो बँधा था?
चीख पड़ा त्याग कर चंचलता, स्वीकार कर ली अपनी असमर्थता,
छलक पड़ा नैनों का गागर, जब समर्पण उर ने कर दिया।
उसकी पराजय में भी जीत थी, शायद वो समझ गया,
लौट आया पल वो, जब प्रियतम का दर्शन हो गया। ‘तरुण’
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