102. Hind Ke Veer – Poem In Hindi

Tribute to Martyrs on Occasion of 26th Jan
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हिंद के वीर
“जर्जर दशा और शिथिल काया, कौन थामेगा बाँह हिंद की,
चिंतन था गहन अधिक और सीमा समय चक्र की  |
व्याकुल हो चला था मन, हर विचार था दिशाहीन,
उत्पीड़न का कष्ट सह रहे थे, सब वासी बनकर दीन |
कालकूट-सा लगता था, मिला भीख में जो भी ग्रास,
आत्म विश्वास का हुआ था अंत, की कहीं लुप्त हो गया था शिव का अंश |
कौन बनेगा मृत्युंजय, गूँज रहा था प्रश्न यही,
धरा मांग रही थी रक्त, और सच्चा देश भक्त |
चीख रहा था उर सबका, कर रहा था रोम-रोम विलाप,
चाह जागी यही चित में, की मिल जाए सुखों का देव |
धधक रही थी ज्वाला, ललकार रही थी पुरुष्तव को,
उठ खड़े हुए कुछ बलिदानी, शोभायमान करने अग्रिम पंक्ति को |
शपथ ली देख दयनीय स्थिति, सौगंध ली अग्नि कुंड की,
जन्म हुआ स्वराज शक्ति का, ली प्रतिज्ञा मिटाने या मिट जाने की |
हुआ शंखनाद  क्रांति का,  गूँज उठा अम्बर सारा,
हिल उठा सिंहासन फिरंगी का, जब लौटा तेज सृजनकार का |
सुसजित था ललाट पर शशि, उनमें से एक था चंद्रशेखर महाबली,
पीछे कैसे रहते भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु, जिनकी बनी ऐतिहासिक तिकड़ी |
झूम उठा भारतवर्ष, इनके आगमन से,
कोट कोट किया धन्यवाद, उस विधाता का कृतज्ञता से |
ना डिगा सकी कोई भी शक्ति, इन अडिग रण वीरों को,
क्या रोक सका है कोई भला, उन्मुक्त गगन की गर्जना को |
चूम लिया सूली को, जैसे माँ की हो बाहें,
मार ली गोली शीश पर, और उतार दिए ऋण सारे |
नहीं दिखा अपना अंत उन्हें, मग्न थे वो अपने में,
मूँद ली आँखें अपनी, स्वंतंत्र भारत की कल्पना में |” “तरुण”

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